Tuesday, November 30, 2010

सच कहता हूं

सच कहता हूँ

नियति में जो बदा था
वह भरपूर मिला
अभी जिन्‍दा हूं
जाने के आसार नहीं हैं
आकांक्षाएं जाती नहीं
मैं क्‍या करूं?
काम करता हूं
आपको जलन क्‍यों होता है?
बूढ़ा भले ही हो गया हूं
महाबूढ़ा नब्‍बे के दशक का
मेरे प्रति कलुष भावना नहीं रखें।
कुछ कर दिखाऊंगाा
तब दांतों तले अंगुली दबाएंगे
मैं इतराता नहीं हूं।
सच कहता हूं।


- गांव से

Monday, August 9, 2010

तितलियां

रंग-विरंगी तितलियों पर

बचपन में जब नजर जाती थी

दौड़ पड़ता था पकड़ने को

एक मनोहारी तितली को पकड़कर

घर लाता था धागा में

उसे बांध कर

उड़ाया करता था।

हाथ से धागा छूटा

तितली अपने संगियों को

खोज लेती थी।

रानी तितली की अदालत में

मुझे पेश होना पड़ा

गलती कबूल कर, उल्‍टे पांव उस दिन

भाग आया था।

मां को जताया नहीं था

आप पोर्टिकों में बैठा हूं

घर में बजती टीवी की आवाज

कानों तक आ रही है, सामने उजली

तितली की एक जोड़ी आती-जाती है

उनसे पूछता हूं, तुम्‍हारे संगी साथ

कहां हैं? तितली की जोड़ी रोने लगती है।

- गांव से

Tuesday, July 13, 2010

पारिवारिक संरचना

सगे छै: थे / तीन बचे हैं

सबसे छोटे भाई की

ओपन हार्ट सर्जरी हुई है

चौथे भाई अस्‍वस्‍थ हैं।

उनका बेटा डायलिसिस पर

गुर्दे की तलाश है

गुहार लगाता हूं

स्‍वयं 86वां पायदान पर

कृतिकार हूं। पढ़ेंगे

दादा के पत्र पोती के नाम

प्रकाशन संस्‍थान / नई दिल्‍ली की।

- गांव से

Friday, May 14, 2010

साइबर गाँव बनाने का सपना

बिहार के जिला सुपौल का 'बसंतपुर' एक प्रखंड है। प्रखंड के प्रवेश द्वार पर मेरा सी॰ के॰ आश्रम है। यह आश्रम मेरा कृषि फार्म है। वहां मछूआरों की आबादी है। उन्हें मुखिया कहा जाता है।

आपने जमीं का मोहरा काटकर उन मछूआरों को करीने से बसाया है। एस बस्ती को मैंने नामांकित किया है सी॰ के॰ पुरम, निषाद बस्ती, सीतापुर। इन मछूआरों को गोढ़ी भी कहा जाता है।

करीने से बसाये गए इन मल्लाहों की बस्ती को देख कर निवर्तमान बी॰डी॰ओ॰ आजित वत्सराज ने थौक में 54 परिवारों को इंदिरा आवश की राशी आवंटित कराइ थी उनका इरादा इसे इंदिरा आवश का कलस्टर बनाने का था। मुझे इस बस्ती के मुख्य द्वार पर अर्ध विर्ताकर गेट बनाने को कहा गया था जिसपर लिखा जाता सी॰ के॰ पुरम, निषाद बस्ती, सीतापुर (सुपौल)।

आज वह संजोया सपना बिखर गया। क्योंकि उधर पास बुक लेकर इतराते मल्लाह घर पहुंचे होंगे , आपने को सहेजने का मौका भी नहीं मिला होगा की कुसहा का बाँध टूट गया। उनकी झोपरियाँ पानी में बह गयी। जान बचने की विवशता में डूबते-उतरते जैसे-तैसे नाहर के बाँध पे ये पहुंचे जहाँ सरकार की ओर से मेघा शिविर चल रहा था। यहाँ शरणार्थी बनकर महीनों दिन गुजरने पड़े। जन जीवन दिसम्बर 2008 पर सामान्य हुआ।

सरकार की ओर से मेघा शिविर बंद हुई सरे लोग आपने घरों को लौट आये। 2008 के अंत तक स्तिथियाँ सामान्य होने लगी।

इनकी इंदिरा आवाश की प्रथम किश्त की राशी कुछ बिचौलिओँ की जेब में गया और शेष अपनी जान बचने में खर्च हो गए । हकीकत आज यही है।

वहां साइबर गाँव बनाने का मेरा सपना बिखर सा गया लगता है न वहां सड़के बनी है न वहां बिजली गयी है.

आज मैं नब्बे के दशक में चल रहा हूँ मेरे शेष जीवन का आधार मेरा पेंसन ही है। लगता है , मैंने दिवास्वप्न देखा था । आज ऐसा ही कहेंगे।
इस इन्टरनेट के ज़माने में sukhdeosahitya.blogspot.com चलता है। मैं इन्टरनेट प्रेमियों से अपील करता हूँ , खाशकर उन समर्थ पेंसन धारियों से यदि कुछ आगे आ जाते तो मेरा बसाया चमन का सपना आज उजाड़ होता दिख रहा है मेरे विवशता का कोई अंत नहीं..................
गाँव से, मजदुर दिवस 2010.

Wednesday, April 14, 2010

शर्मिंदगी

 

   शंभू बाबू को जानकारी मिली कि उनके बेटे की पोस्टिंग बिहारशरीफ हो गई है, तो उनहें खुशी हुई। इस मानी में कि उनके पिता पुलिस विभाग में एस.सी. के पोस्‍ट पर अस्‍सी बरस पहले बृटिश शासनकाल के जमाने में आये थे। उस समय शंभू बाबू की उम्र आठ वर्ष की थी। पर उन दिनों की कुछ प्रमुख घटनाओं उनके दिमाग में तरोताजा थीं जिन्‍हें आज 2004 में उन स्‍थलों की तलाश में वे गये, तो सबकुछ बदला-बदला दीखा। जैसा कि जिस क्‍वार्टर में अस्‍सी बरस पहले वे माता-पिता के साथ रह चुके थे, उसकी पहचान नहीं कर पाए। दूसरी याद में मखदूम साहब की दरगाह का परिवार उन्‍हें बदला-बदला दीखा। बचपन की आंखों से शंभू बाबू ने जैसा देखा-सुना था, आज का मंजर उन्‍हें कुद और ही दीखा। मकबरा में प्रवेश करने के पहले रास्‍ते के दोनों तरफ छोटे-बड़े कब्र भरे पड़े थे।

   भीतर दरगाह में प्रवेश करने के बाद वहां के रस्‍मों-रिवाज के मुताबिक उन्‍हें पहले गोशुल (हाथ-पांव धोने के लिए नल पर जाना पड़ा।)

   गोशुल करके मखदूम साहब के कब्र के पास आने पर वहां ड्यूटी पर तैनात एक शख्‍स ने दोआ मांगने के लिए तौर तरीकों की उन्‍हें जानकारी दी। पर शंभू बाबू लाचार से दिखे क्‍योंकि आज उनकी उम्र तो नब्‍बे में चल रही है।

   दोआ मांगने के नाम पर शंभू बाबू ने कहा, मैं क्‍या मांगू।. खुदा ने हमें सबकुछ से भरपूर कर दिया है।

   जिस रिक्‍शा से बेटे के बंगले से मखदूम साहब के दरगाह पर गए थे उसी रिक्‍शे से शंभू बाबू लौट आये। चपरासी उन्‍हें पहुंचाकर चला गया। लौटने तक दोपहर हो गया था। गरम-गरम हवाएं चलने लगीं। मई का महीना चल रहा था। बिजली चली गई थी। उन पर हाथ का बेना बहू झलने लगी। फिर थोड़ी देर बाद बहू ने खाना खिला दिया।

   शंभू बाबू ने बहू से कहा, 'जरा बेटा से कहो, बाबूजी कल चले जाएंगे। वे उनके बैंक में आना चाहते हैं।'

   शंभू बाबू के कहने के मुताबिक बहू ने फोन किया। पर उधर से जवाब मिला, 'बाबूजी को कहो आराम करें। तपिश में बैंक कहां आएंगे!'

   पर शंभू बाबू को यह बात लग गई। उनका छोटा भाई जो इलाहाबाद बैंक में चालीस बरस पहले पटना की नई शाखा के मैनेजर के बतौर उनकी पोस्टिंग हुई थी। उस समय शंभू बाबू को छोटे भाई ने बैंक में बुलाया था, तो वहां जाने पर भाई ने अपने चेम्‍बर में उन्‍हें बिठाया था। बारी-बारी से उनके आतहत के सारे स्‍टॉफ को उन्‍होंने उनसे परिचय कराया था। तो बेटा ने टका-सा जवाब क्‍यों दे दिया और अपने बूढ़े बाप को बुलाकर उन्‍हें क्‍या शर्मिंदगी का एहसास होता। इस कारण तो नहीं ऐसा कुछ हुआ है।

   शंभू बाबू मन ही मन झुंझला उठे। अपने बुढ़ापे के शरीर के डील-डौल पर विचार करने लगे। सोचने लगे कि मैं थोड़ा झुक गया हूं। अंजर-पंजर ढीला ढीला सा हो गया है। झुर्रियां पड़ गई है। इस कारण से तो बेटा ने अपने बैंक में उन्‍हें नहीं बुलाया और इधर शंभू ने सोचा था कि वह अपने चेम्‍बर में बिठाएगा और बारी-बारी से अपने स्‍टॉफ से परिचय कराएगा, जैसा कि उनके भाई ने चालीस बरस पहले कर दिखाया था।

   शंभू बाबू के सोचने का तार टूटा नहीं था। वे मुंबई छोटे बेटा के यहां गए थे। एक दिन ऐसा हुआ कि वे ड्राइंगरूम में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। पोती ने उन्‍हें आकर कहा, 'बाबा आप अंदर के कमरे में चले जाएं। कुछ लोग पापा से मिलने आ रहे हैं।'

   शंभू बाबू का ताना-बाना ऐसा ही कुछ चल रहा था। बिजली आ गई। पंखा चलने लगा। उन्‍हें नींद आ गई।

बहतर वर्ष पहले की एक ग्रामबाला

   मैं अभी अठासी के उत्तराद्ध मैं हूं। कल तक मैं नकारता रहा, कोई मुझे बूढ़ा ना कहे। किन्‍तु अब एहसास हो रहा है। एक सच को क्‍यों नकारता आया। शायद इसलिये तो नहीं कि मेरे दिल में बुलन्‍दी है। बराबर लिखना-पढ़ना चलता रहता है।

   जिन दिनों की कर रहा हूं। उस समय मैं अपनी दादी के साथ रहता था। चम्‍पानगर में। सुखराज राय हाई स्‍कूल, नाथनगर भागलपुर का सातवां क्‍लास का विद्यार्थी था। 1937 ई का जमाना था। अंगिका मैं 'नैना भुटका' या 'नूनू' छोटे बच्‍चों को कहा जाता है। दादी ने मुझे कहा, 'रे नूनू, रामफल गंगोता को बुलालाओ। मोहनपुर दियारा में दादी की जमीन गंगशिकस्‍त हो गई थी, वह बाहर हुई थी। रामफल खेती का देखभाल करता था। फतेहपुर में नाव मिलती थी। रविवार का दिन था। सूर्योदय के पहले दादी ने जगा दिया। चैत का महीना था। बासन्‍ती बयार चल रही थी। पौ फट रहा था। गंगा नदी तट पर मैं पहुंच गया। तट पर नाव लगी थी। नाव पर बैठ गया। इक्‍के-दुक्‍के लोग नाव पकड़ने आ रहे थे। उधर पूरब दिशा में मेरी नजर गई। सूरज की लाल लाल किरणें प्रवहमान गंगा के निर्मल जल पर झिलमिलाती देख रही थी। नाव खुलने-खुलने पर थी। तभी एक ग्रामबाला बेतहाशा दौड़ती आ रही थी। उसके सिर पर छिट्टा था। शायद घास लाने के लिए निकली थी। उस समय उसे अपने शरीर बदन के कपड़ों की कोई सुधि नहीं थी। उसका रूप रंग उलझा हुआ बाल। साड़ी में लिपटी, खुला बदन, फड़फड़ाता आंचल, अंगिया न ब्‍लाउज। बदन में उठान हो चुका था।

   बहतर वर्ष बाद। उसकी वह सूरत, उसकी खूबसूरती, जो मैंने देखी थी। मेरे शरीर में उस समय कोई काम वासना का संचार नहीं हुआ था। पर मेरी आंखों के आगे आज भी वह दृश्‍य, कभी-कभी छा जाता है, तो बड़ा अच्‍छा लगता है। उस खूबसूरती का बखान आज इस उम्र में कर रहा हूं। आज भी मेरी मनोदशा वही है। आपको कैसा लग रहा है।. 

Monday, April 5, 2010

ओछापन

ओछापन

   वे डायनिंग टेबुल पर बैठे थे। पोती से पूछा -'नाश्‍ता क्‍या है?' बना कुछ नहीं है, कार्न फ्लेक देती हूं।' उनने कहा 'नहीं, सुनकर बुखार लग जाता है।'

   उधर से बेटा दौड़े आये। उनसे पोती ने जोड़ दिया बाबा कार्न फ्लेक नहीं लेंगे। 'ब्रेड है।' 'हां।' वही दे दो।

   बटर लगा दो ब्रेड का स्‍लाइस आगे रख दिया गया। फिर कच्‍चा रसुगुल्‍ला परोसा गया, काला जामुन भी।

   बात आई दूध की! बाबा ने कहा, 'चार दिनों से दूध लेने का मौका नहीं मिला! इस पर बाबा की बात को लल्‍लू ने काटते हुए कहा, 'उसी दिन न दिया था।'

   बाबा चुप। बोर्न भिटा युक्‍त गरम-गरम दूध आगे आया।

   उनकी धर्मपत्‍नी, अम्‍मां, पास ही बैठी थीं। 'आपको क्‍या हो गया है। ऐसी बोली क्‍यों? रोज गीता पढ़ते हैं, रामायण का पाठ करते हैं। माला ठक ठकाते हैं। वाणी में मिठास नहीं आई! सब बेकार।

   बाबा चुपचाप अपने कमरे में चले गए। कहा कुछ नहीं।

   अन्‍तर्मन की आवाज सुनी। 'तुमको क्‍या हो जाता है। परिवार में तुम्‍हारी गरिमा है। ओछापन जाता नहीं। अम्‍मां की अनुसुनी न करो। तुमको नसीहत दी जायगी।.

 

Wednesday, February 24, 2010

चटोरपन

गफूर भाई तेज तर्रार किस्म के आदमी हैं। लोग उनकी उम्र पूछते हैं, "दादा हो, आपकी उम्र क्या हुई।" तपाक से कह बौठते हैं, "जरा तू ही बता, मेरी उम्र क्या हो सकती है?" "बड़का भूकम्प के वख्त आप कित्ते साल के थे।" "उस वख्त की बात करते हो, दो जमात पास कर गया था।"
"दादा, गजब की बात करते हो!"
"क्या हुआ बे!"
"दो जमात से बात कहां खुलती है कि आप कित्ते बरस के थे।"
"ओ! तो तुम उमर जानना चाहता है। अब समझा। यही बारह-चौदह साल का होगा।"
फिर गफूर भाई बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गए। कम्बखत सब उमर पूछते रहता है। क्या बूढ़ा होना गुनाह होता है। आज बच्चा पैदा होता है, बड़ा होता है। जवान होता है। तालीम हासिल करता है। निकाह होता है। नौकरी लग जाती है। अपनी औलाद की परवरिश करता है। उसी तरह तुम भी बूढ़ा होगा। बच्चा, बूढ़ा, यह सिलसिला तो लगा है।
छड़ी टेकते, घर की ओर डेग भरते हुए, गफूर भाई बढ़ते जा रहे थे। पाकेट में पैसा टटोला। खुशी हुई। "अमां, यार अपने को कहा। तो क्या कुछ हो जाय। "सुधा" का काउंटर आगे आ रहा था। रहमत भाई, सुधा काउंटरवाले उनको देख रहे थे। टोक दिया। "भाई जान, कहां गए थे। अकेले चलते हैं। किसी बच्चे को संग क्यों नहीं कर लिया?" इस पर आव देखा न ताव। उस पर गफूर भाई, बिगड़ बैठे।
गजब के तुम हो? तुम्हारा जर्जर बदन देखकर कोई चेताता है। रहमत भाई ने तुम्हारी भलाई की बात की है। और तुम बिगड़ बैठे, उन पर।
जाने दो, देखो रहमत भाई से पूछो न, क्या सब है! रहमत भाई से रू-ब-रू होते ही पूछ बैठे, "क्या सब है?"
"सब कुछ है।" रहमत भाई का जवाब मिला।
फिर गफूर भाई की मजबूरी का आलम आ खड़ा हुआ। ससुरी सरकार जहां-तहां अपने " सुधा" सेल पाइंट काउंटर एक ही डिजाइन की बनाती है। राजधानी से छोटे बड़े शहर तक फैला रखी है। इसके ब्रांड की तारीफ गुनते रहे। कमाल का पेड़ा होता है। पांच से लेकर चौदह रूपये तक का, स्ट्राबेरी का आइसक्रीम। रसगुल्ला, दही, लस्सी..
गफूर भाई की मजबूरी रहमत मियां ताड़ गए। रूकिये मैं आ जाता हूं। और गफूर भाई का हाथ पकड़ कर ऊपर ओटे पर चढ़ा लिया। गफूर भाई एक ओर खड़े थे। दो ग्राहक आ गए। एक ने एक लीटर दूध की मांग की। पाकेट से नंबरी निकाला। इस पर रहमत मियां ने तपाक से कहा। "नंबरी का खुदरा नहीं है। चट से ग्राहक ने कहा, "पचास देता हूं।" दूध लिया खुदरा वापसी में रहमत भाई ने दो टॉफी, नोट और सिक्का दिया था।
"दूध का कित्ता पइसा काटे।"
"चौदह रुपये।"
"ज्यादा क्यों?"
"दाम बढ़ गया है।" वह वापसी पैसे को मिलाने लगा। दस का नोट तीन है, एक पांच का है। "कित्ता हुआ?" रहमत भाई ने पूछा।
"पैंतीस।" उस लड़के ने कहा।
"ठीक है, और दो टॉफी का दाम एक रुपया। हुआ न छत्तीस।"
उसके बाद दूसरे ग्राहक से निबटने के बाद गफूर भाई से पूछा, "आपको क्या चाहिए?"
"लस्सी।"
"नहीं है।"
"पेड़ा ले लें, चौदह का है।"
गफूर भाई रूक गए।
"फिर आइसक्रीम है, पांच, दस और चौदह का।" रहमत भाई ने कहा।
"दस का दे दो।" गफूर भाई बोले। रहमत भाई ने दस का आईसक्रीम आगे किया। प्लास्टिक का चम्मच दिया। फिर गफूर भाई बिफर पड़े। रहमत भाई से पूछा। यहां-वहां चिपटा हुआ आइसक्रीम का खाली कप। लगता है चादर सफेद बिछी है। डस्ट बिन क्यों नहीं रखते? गफूर भाई ने सवाल रक्खा!
क्या करें साहब। मुख्यमंत्री का बेल्ट है। गली, कूची सब बन गया है। यह रास्ता फ्रोफेसर कॉलोनी जाती है। यहां के लोग जदयू के नहीं हैं। यहां नगरपालिका का झाड़ू देनेवाला भी नहीं आता है।
गफूर भाई के नहाने का वक्त हो रहा था। बाल बनाने गए थे। गप्प भी चल रहा था। आइसक्रीम चाट गए। छड़ी हाथ में ली। ओटा से उतर गए। फिर आगे कदम-ब-कदम डेग बढ़ाते हुए घर की ओर जा रहे थे।
फिर भीतर की आवाज आई, तुम्हारा चटोरपन गया नहीं। चौदह का पेड़ा ले लेते तो घर भर खाते।
सैलून से हजामत बनाकर लौटे हो। बीवी जान को जवाब देना। वहां भी हजामत बनेगी।
घंटी बजाई। किवाड़ खुला। पंखा खोलकर बैठ गए। उधर से पोते-पोतियां आईं। बीवी जान आईं । पूछा, "कुछ लाये नहीं!" गफूर भाई की घिग्घी बंध गई।

Saturday, February 20, 2010

अवध बिहारी प्रसाद

पटना पहुंचने पर उस दिन अवध बिहारी बाबू को उनके मोबाइल नंबर पर रिंग किया और अपना नाम बतलाया और पूछा, 'अवध बिहारी बाबू हैं!'
उधर से जवाब आया, 'मैं मीनी उनकी बेटी बोल रही हूं। वे तो पिछले दिनों गुजर गए। श्राद्ध भी हो गया। जिस नंबर पर आप बात कर रहे थे। वह मोबाइल मेरा ही था।
तुरंत मैंने फोन रख दिया। और इस वर्ष का उस दिन को याद किया जब अवध बाबू की तलाश में चांदमारी रोड न. 3 पर बुद्ध नगर में दिनेश्वर प्रसाद के मकान की तलाश में यहां-वहां भटक रहा था। एक जगह रिक्शा रोक कर बाहर बैठी एक महिला से पूछा, क्या दिनेश्वर प्रसाद का यही मकान है? अवध बिहारी बाबू यहां रहते हैं!' उधर से जवाब मिला, 'हां।' और वह महिला अवध बिहारी बाबू की पत्नी ही थीं।'
वह मुझे भीतर ले गईं। एक तंग रास्ते से कई कमरों के बाद एक छोटा-सा कमरा मिला। अवध बिहारी मिले और वे मुझे देखते ही विफर पड़े। बोले, 'बच्चा भइया।'
उनकी मनोदशा देखकर मैं मन ही मन द्रवित हुआ। पास पड़ी खाली कुर्सी पर मैं बैठ गया। वे अपने बारे में एक थैरेपी वाले से राय परामर्श की बातें कर रहे थे। उस आदमी के जाने के बाद उन्हें 'इन्द्रधनुष' की एक प्रति भेंट की। तुरंत ही उन्होंने एक अखबार के कतरन पर कुछ लिखकर मेरे बारे में दिया। जो इस प्रकार है '...नारायण शुकदेव बन... आनन्द पथ पर लिये चलें।'
सामान्यत: मेरी हर किताब पर उन्होंने अपने उद्गार लिखकर दिये हैं। मैं उन्हें अपनी फाइल में सुरक्षित रख छोड़ा है। यथा समय उसका उपयोग करने के खयाल से।
ज्यादातर इस वर्ष 2007 में घर पर ही रहा हूं। वीरपुर में उनका कुशल क्षेम उनके मित्र एस एन प्रसाद के घर जाकर उनके फोन पर अवध बिहारी बाबू का हाल चाल लिया करता था।
इसी वर्ष उनके एक मित्र, बी एन दत्त ने मुझे जानकारी दी कि अवध बिहारी बाबू ज्यादा लाचार होते जा रहे हैं। उनके मेरूदण्ड (रीढ़ की हड्डी) में गड़बड़ी है। यह अक्तूबर' 07 की बात होगी।
एस एन प्रसाद अपनी बेटियों से मिलने हजारीबाग-रांची जा रहे थे तो उनके पते पर उनसे वे मिलने गए थे। अवध बिहारी बाबू अपनी बेटी के घर शास्त्रीनगर आ गए थे। मुझे भी उन्होंने शास्त्रीनगरवाला पता बतलाया था। पर मेरा दुर्भाग्य है कि मैं उनसे दुबारे नहीं मिल सका।
अब वीरपुर में उनसे जुड़ने के दिनों और खास-खास अवसर पर हमारे उनके बीच बढ़ती निकटता को याद करता हूं।
जिन दिनों वे सरकारी सेवा में कार्यरत थे उसी समय से मेरा उनके क्वार्टर और कार्यालय में आने-जाने का सिलसिला जारी था। घनिष्टता बढ़ने का एक कारण यह भी हुआ कि जहां मेरा कामत है वहां मुख्य सड़क से जाने के समय पहले उनकी जमीन सड़क की दोनों ओर मिलती थी। मेरे कामत का सिलसिला जमा हुआ था।
खेती-बारी संबंधी राय-मशवरा वे मुझसे लिया करते थे। अक्सर वे अपनी जमीन की फसल देखने स्कूटर से जाया करते थे। एक बार मेरे आवास के पास ही वे दुर्घटनाग्रस्त हो गए। उनका पांव टूट गया था। उपचार के बाद वे लंगड़ाने लगे। उससे फायदा यह हुआ कि उन्हें 'अपंग' का एक सर्टिफिकेट मिल गया। उसका लाभ भी वे उठाने लगे।
अवध बिहारी बाबू के रिटायर करने के बाद हमारी और उनकी निकटता बढ़ने लगी। वे होमियोपैथी के अच्छे जानकार थे। हम दोनों होमियोपैथ और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में विश्वास रखते हैं। अक्सर वे मेरे घर पर जब आते थे तब कोई न कोई नुस्खा मेरे लिए या धर्मपत्नी के लिए लिख दिया करते थे। उनके मुताबिक दवा सेवन करने से लाभान्वित भी हमलोग हुए हैं।
नौकरी से रिटायर करने के बाद मुझे अपने पोख्ता घर की नींव देनी थी। मेरे छोटे भाई ने चार कमरों के मकान का प्राक्कलन बनाकर भेजा था। उसकी नींव दिलवानी थी। बैसाख का महीना चल रहा था। उस समय अवध बिहारी बाबू एक राज मिस्त्री और लेबर लेकर आये और दिन भर तेज धूप में खड़ा होकर नींव खोदवाने के समय मौजूद रहे। आज उसी घर में हम बाल बच्चों के साथ रहते हैं।
बागवानी और पेड़-पौधा लगाने का शौक अवध बिहारी बाबू में था। उन्होंने भी रिटायरमेंट के बाद कोशी कॉलोनी के जस्ट सटे पश्चिमी रोड के किनारे अपने पोख्ता मकान में हाथ लगाया था। पर उनका घर अधूरा रह गया। सरकारी मकान को खाली करने का दबाव उन पर बढ़ता गया। अत: निर्माणाधीन निजी मकान में रहने चले गए थे।
उनके बाल-बच्चों की बात जहां तक है, उन्हें तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। बड़ा बेटा इलाहाबाद में रस-बस गया है। अवध बिहारी बाबू के साथ कोई खास सरोकार नहीं रहता था। दूसरा बेटा काबिल नहीं बन पाया। उसकी औलाद की परवरिश इन्हें ही करनी पड़ती थी। तीन-तीन बेटियों की शादी करने में ही अर्जित जमीन उनकी बिक गई। लड़कियों की शादियों से वे निपट चुके थे। यहां-वहां करने में वे टूट चुके थे।
अपने मकान के आगे वे फलदार वृक्षों में अमरूद, आम और अनार लगा चुके थे। मेन रोड से अपने घर तक पहुंचने का एप्रोच रास्ता उनका मिट्टी का है। दोनों ओर मौसमी फूल लगा रहता है।
मैं अपने अहाते में कुछ आम के कलम लगा चुका हूं। वे फल देने लगे हैं। अमरूद और लीची के पेड़ भी हैं।
जिन फलों का सीजन होता, उस समय कभी साइकिल से, भूलते-भटकते या समय देकर आते तो उनसे बातें हुआ करती थीं। और पके फलों का आस्वाद भी लिया करते थे।
वीरपुर में कोशी कॉलोनी में उनके घर के पीछे एक घर पड़ता है। उनके यहां अक्सर जब जाता रहता हूं और अपने घर में वे मिल जाते थे, तो मुझे एक बार कुछ नाश्ता या चाय अवश्य पिलाया करते थे। उनके बच्चों से भी बातें होती थीं।
आज वे नहीं रहे। उनके साथ गुजरे जमाने की बातें, मेरी स्मृतियों में आती-जाती रहेंगीं। खासकर अभी जो एक कहानी-संग्रह 'मझाधार' मेरा आ रहा है। अब उस पर बेबाक एक भाई की टिप्पणी नहीं मिलेगी। उन्हें अपनी नई किताब भेंट किया करता था। उसका मूल्य देखकर वे मना करने पर भी मेरे पॉकेट में उसके समतुल्य मूल्य की राशि डाल दिया करते थे। अब वह जाता रहा।

Saturday, February 13, 2010

डीह की तलाश में

नयागांव एक छोटा-सा कस्बा जैसा हो गया है। हाजीपुर और छपरा के बीच सोनपुर के पास, वहां दादा का मिट्टी का घर था। वहां की बचपन की बातें और उसका स्वरूप अभी भी आंखों में तौर जाता है। उन दिनों वह गांव जौसा था। सरयू नदी के किनारे बटोहिया के कवि रघुवीर नारायण वहीं के थे। यह बात बीसवीं सदी के चालीस के दशक की है। छपरा से सुबह ग्यारह बजे चला था। ठौर-ठिकाना का पता लगा लिया था। कहां उतरना है, वहां पहुंचने पर किस से संपर्क करना है।
नयागांव थाने के पास उतरते ही विजय सिंह से भेंट हो गई। उनसे अपना दुख-दर्द और अपनी मंशा बताई कि मुझे आप देख ही रहे हैं। पता लगाने आया हूं। मेरा डीह सुरक्षित है या नहीं। उन्हें उसका ठौर-ठिकाना बता दिया। हम दोनों पूछते हुए उस स्थान पर पहुंचे, जहां कभी मेरे दादा का घर था। वह डीह में तब्दील हो चुका था। उसे सुरक्षित पाया। तत्काल जानकारी मिली कि किसी की जोत में है यह डीह। वह कहता है कि मैंने इसे जमीनवाले से खरीद ली है।
इतनी जानकारी लेकर मेन रोड पर लौट आया। छपरा लौटना मुनासिब समझा। जाड़े का मौसम था। 2 दिसंबर 2007 की संया गहराने लगी। मेन रोड पर विजय सिंह छपरा जानेवाली बसों को रूकवाते रहे। किसी ने भी बस नहीं रोकी। मैं पशोपेश की स्थिति में था, जिन से आज मेरा परिचय हुआ उनके यहां रात में टिकना मुनासिब नहीं लगा। मुझे एक बात की चिंता मन में लगी हुई थी कि छपरा बेटी के घर में और उसके अहाते में सभी घर के लोग बारात चले गए हैं। अत: मुझे छपरा लौट जाना चाहिए। मैंने विजय सिंह से रेल गाड़ी का समय पूछा। बाबू साहेब ने कहा, संध्‍या 6.30 बजे छपरा की गाड़ी मिलेगी। सोचा दो-तीन घंटे में ही ट्रेन से छपरा पहुंच जाऊंगा। करीब 10 बजे रात में। उनसे छुट्टी मांगी, बाबू साहब ने कहा, 'दुआर पर चलीं, कम से कम चाय तो पीलीं।' उनका आग्रह टाल नहीं सका। चाय पीकर नयागांव रेलवे स्टेशन की ओर भागा। नयागांव स्टेशन के प्लेटफार्म की ऊंचाई और सीढ़ियों को देखकर मेरा सिर चकरा गया। चढ़ने में अपने का अक्षम पाया तो अगल-बगल झांकने लगा। एक नौजवान को ऊपर चढ़ते देखा, कहा बेटा मुझे भी मदद करो। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मैं ऊपर आ गया।
पूरब-पश्चिम से गाड़ियां आती-जाती रहीं। छपरा की ओर जानेवाली रेलगाड़ी के इंतजार में मैं बौठा रहा। बेंच पर बौठा था बुकिंग ऑफिस के सामने। बिजली गुम थी। एक झपकी आ गई, आंखें खुलीं, तो देखा छपरा जानेवाली गाड़ी लगी है। टिकट कटाया, दौड़कर गाड़ी की ओर बढ़ता गया। गाड़ी ससर रही थी। दो जनों ने मुझे डब्बे के अंदर खींच लिया।
पसिंजर गाड़ी थी। रूक-रूक कर बढ़ रही थी। छपरा पहुंचते-पहुंचते 12 बजे रात का समय हो गया। बाहर कोई रिक्शा नहीं मिला। सड़क पर बिजली नहीं थी। उस रात घनघोर लगन था। जहां-तहां रास्ते में बारात पार्टी की रोशनी मिलती गई। गिरते-पड़ते बेटी के घर की ओर कदम बढ़ाते जा रहा था। इक्के-दुक्के लोग भी मिलते गए। आखिर बेटी के दरवाजे पर पहुंच गया। पुकारता रहा, चिल्लाता रहा। गेट बंद था। अगल-बगल के लोग जग गए। सोचा पास के घर चला जाऊं। गनीमत हुई कि बेटी जगी, धर्मपत्नी भी जगीं। मैं घर के भीतर आया। बेटी ने घर का दरवाजा बंद किया। दोनों में किसी ने खाने-पीने के बारे में नहीं पूछा। उनके तेवर चढ़े थे। पर यह कहा, 'जहां गए थे, वहीं क्यों नहीं रह गए।' मैं उन्हें यह नहीं कह सका कि तुम दोनों अकेली थीं इस कारण वहां नहीं रूका।
मुझे ड्राइंग रूम में छोड़कर अपने कमरे में दोनों चली गईं। मैं अवाक् रहा। टेबुल पर बिस्कुट पड़े थे। कुछ खाया, पानी पीकर सो गया।
सोचता रहा, इन दिनों विदेशों से अपने-अपने पूर्वजों की तलाश में प्रवासी भारतीय आने लगे हैं। उनका पता मिलने पर वे लोग जितना इतराते हैं, उसी तरह की खुशियां मेरे दिल-दिमाग पर तैरती रहीं। उस रात मैं अपनी खुशियों को बांट नहीं सका कि हमारा डीह मिल गया। और वह सुरक्षित है। #

Friday, February 12, 2010

तितलियां

रंग बिरंगी तितलियों पर
बचपन में जब नजर जाती थी
दौड़ पड़ता था, पकड़ने को
एक मनोहारी तितली को पकड़कर
घर लाता था। धागा में
उसे बांधकर
उड़ाया करता था।
हाथ से धागा छूटा
तितली अपने संगियों को
खोज लेती थी।
X X X

रानी तितली की अदालत में
मुझे पेश होना पड़ा
गलती कबूल कर
उलटे पांव उस दिन
भाग आया था।
मां को जताया नहीं था।
X X X
आज पोर्टिकों में बैठा हूं।
घर में बजती टीवी की आवाज
कानों तक आ रही है।
सामने उजली तितली की एक जोड़ी
उड़ती आती हैं।
उनसे पूछतता हूं
तुम्‍हारे संगी-साथी
कहां है?
तितली की जोड़ी
रोने लगती है।

Thursday, February 11, 2010

प्रकृति के आंगन में

मन विभोर है
आम, अशोक, आंवला / कदम्‍ब, लीची
के पेड़ों को देखकर
कुछ क्षणों बाद सूर्यास्‍त होगा।
पश्च्मि आंगन के बराण्‍डे पर
खड़ा होना मुश्किल होगा
सूरज का तापमान चरम पर
विकल होता मन
बच्‍चे मद्रास गये हैं
अम्बिका भवानी की
कलश स्‍थापना होती है
इस सिलसिला का निर्वहन
करता आया हूं
धर्मपत्‍नी 'अम्‍मा' बूढ़ी हो गई।
आज हमदोनों ने इसे स्‍वीकार किया।
उनकी सीख की घूंट / सबकी तिलांजलि दें / सौंप दें बड़े को
गले नहीं उतर रही
क्‍या करूं ? कहता हूं,
मेरी उफली बजती रहेगी।

Monday, February 8, 2010

निरन्‍तरता

गायत्री परिवार के संग
निरन्‍तरता थीं
आज व्‍यतिरेक क्‍यों हुआ?
सुबह 27 सितम्‍बर 09, नवरात्रा की
पूर्णाहुति थी / शक्ति स्‍थल जाना था
पक्‍का मन था, तैयारियां
कर ली थी।
X X X

सहसा मनोबल टूट गया
अंग शिथिल हो गए
लिख डाला 'क्षमा याचना'
गरीगोला भिजवा दिया
पूर्णाहुति में देने के लिए
आंखें वंचित रहीं
उन क्षणों को कैद करने को
मोबाइल रूठ गया
वंचित रहा, गिरफ्त में
होने के लिए / उन क्षणों को
यह पहली बार हुआ
जब से जुड़ा हूं।

Tuesday, January 19, 2010

अब

गंगा प्रदूषित
हो गई
गंगा में नहाना
बंद हो गया
पर अभी
उस दिन / पटना की सड़कों पर
कार्तिक पूर्णिमा की
पूर्व संध्‍या वेला में
सिर पर गठरी लिए
पुरुष-महिला-बच्‍चे
गंगा तट की ओर
जाता देखा
गांववासियों की
अपार श्रद्धा
गंगा के प्रति
बरकरार है।

Monday, January 18, 2010

वे दिन

छपरा से
चलता था
सोनपुर आता था
वहां से / घटही रेलगाड़ी
पहलेजा घाट
पहुंचाती थी।
उधर जहाज का
भोंपा बजता
जट्टी के पास
एक डुबकी
लगायी
गंगा मइया की
ऐसा ही होता था
उन दिनों।

Tuesday, January 12, 2010

उधर

हवा में तैरती
फुसफुसाहट
कानों तक आती है
कान खड़े हो जाते हैं
सुनो जी!
जरा कान लगाओ
हां...
कब तक
बाकी सुनायी
नहीं दी
यही तो नहीं...
क्‍या!
इनकी मौत?