यों समय बदलता जा रहा है.फिर भी घर-परिवार की महिलाएं संकीर्णता और उंच-नीच के प्रति दोहरी नीति से उबार नहीं पायीं हैं।
उस दिन की बात है.परिवार के ही एक गूंगे लड़के ने घर से गिलास में पानी लाकर दलित जाती के मजदूर को दे दिया ,जिसके लिए केले के पत्ते पर खिचड़ी परोसी गई थी.खिचड़ी उसके लिए अलग से पकाई भी गई थी,जबकि चौके में उस दिन अच्छा खाना पका था.घर-परिवार के बर्तनों में बुढिया मालकिन के सामने बहु चाह कर भी वैसे मजदूर को घर की थाली में भोजन परोस कर नहीं दे सकती थी।
मालकिन जब बाहर निकलीं तो उनकी नज़र उस गिलास पर पड़ी,जिसमें उस मजदूर को पानी दिया गया था .वह दहारने लगीं की मेरे गिलास में उसे पानी किसने दिया।
उन्हें कहा गया की रामदेव पापा ने दिया है तो वह उस पर बिफर पड़ीं.तत्काल उस गिलास को उनहोंने फ़ेंक दिया और कहा की गिलास एक दलित ने जूठा कर दिया।
उस समय वह मजदूर चांपाकल पर अपना हाथ मुंह धो रहा था.घर की बूढ़ी मालकिन की आवाज उसके कानों तक गई.पलट कर उसने कहा,'माई जी!हममे गिलास मुंह नै लगैले छलों।'
फिर बारी में आम के पेड़ के नीचे बैठ कर उसने अपने बटुआ से सुपारी निकली,कतर कर मुंह में डाला और एक बीडी सुलगा कर पीने लगा।
जब शाम होने को आई तो घर के मालिक से उसने मजदूरी ली और अपने घर की ओर चल पड़ा.उसे आठ किलोमीटर की दूरी तय करनी थी.ताबड़तोड़ साइकिल चलाता गया।
वह मजदूर हफ्ता में एक दिन अभी भी आता है.उसके झोला में लोटा रहता है.उसमें वह पानी टू स्वाभिमान से पी लेता है.पर उसे खाने के समय केले का पत्ता लेन को कहा जाता है तो वह मन ही मन सोचता है,'क्या मैं इस घर की थाली में खाने का अधिकारी नहीं हूँ.'
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Wednesday, February 13, 2008
Monday, February 11, 2008
हक्का-बक्का
नॉन-स्टॉप बस एक जगह रुकी.कंडक्टर ने समझा कोई हजारीबाग की सवारी होगी.बस के भीतर आगे एक महिला,पीछे से उसका पति जैसा जवान सफ़ेद कपडों में बढ़ा.कंडक्टर ने पूछा,कहाँ जाना है,उसने पास के किसी गाँव का नाम लिया.कंडक्टर ने कहा,उतरिये..यह एक्सप्रेस बस है.तुरंत उस युवक का तेवर बदला और उसने कहा,बदतमीज!पहचानते नहीं.मैं स्टाफ हूँ.बड़ा हाकिम हूँ.चुपचाप बैठो.ड्राईवर से कहा,बस बढाओ भाई।
कंडक्टर हक्का-बक्का.उसकी बन्दर घुड़की पर ही उसे लगा कि हाथापाई होगी.कंडक्टर अपने ढंग से उसका प्रतिवाद करता रहा.सारे मुसाफिर दोनों की बातें सुनते रहे.किसी मुसाफिर ने उनके बीच आने का,इस झमेले को छुड़ाने की कोशिश नहीं की.सारे मुसाफिर मूक दर्शक बने रहे.कंडक्टर मेरी बगल में आकर बैठ गया.मैं भी चुप रह.एक दो और पैसेंजर से उसने भाडा लिया.टिकट नहीं दिया।
इस बीच झपकियाँ लेते-लेते मैं लंबी नींद में चला गया.मेरी आँखे खुलीं तो जहाँ वह महिला बैठी थी,वह नहीं दिखी.मैंने समझा वह जुझारू,दबंग आदमी,शेखीबघारने वाला उतर गया होगा.कंडक्टर मुँह बंद कर चुका था।
फिर मैंने कंडक्टर से पूछा,"क्या आपने उन दोनों से भाड़ा मांगने का जुर्रत उठाया.उसने कहा,"नहीं"।
मैंने पूछा."क्या वह आपका स्टाफ सही में था.""नहीं कह सकता."उसका जवाब.आगे उसने कहा,"ऐसा हजारीबाग की तरफ होता,तो विस लोगों से पैसेंजर भी दो हाथ देख लेते हैं।"
फिर आज की अराजकता की बातें हुईं.कंडक्टर उनके उतर जाने के बाद,कमीज झाड़कर,अपनी शेखी बघारने लगा.
कंडक्टर हक्का-बक्का.उसकी बन्दर घुड़की पर ही उसे लगा कि हाथापाई होगी.कंडक्टर अपने ढंग से उसका प्रतिवाद करता रहा.सारे मुसाफिर दोनों की बातें सुनते रहे.किसी मुसाफिर ने उनके बीच आने का,इस झमेले को छुड़ाने की कोशिश नहीं की.सारे मुसाफिर मूक दर्शक बने रहे.कंडक्टर मेरी बगल में आकर बैठ गया.मैं भी चुप रह.एक दो और पैसेंजर से उसने भाडा लिया.टिकट नहीं दिया।
इस बीच झपकियाँ लेते-लेते मैं लंबी नींद में चला गया.मेरी आँखे खुलीं तो जहाँ वह महिला बैठी थी,वह नहीं दिखी.मैंने समझा वह जुझारू,दबंग आदमी,शेखीबघारने वाला उतर गया होगा.कंडक्टर मुँह बंद कर चुका था।
फिर मैंने कंडक्टर से पूछा,"क्या आपने उन दोनों से भाड़ा मांगने का जुर्रत उठाया.उसने कहा,"नहीं"।
मैंने पूछा."क्या वह आपका स्टाफ सही में था.""नहीं कह सकता."उसका जवाब.आगे उसने कहा,"ऐसा हजारीबाग की तरफ होता,तो विस लोगों से पैसेंजर भी दो हाथ देख लेते हैं।"
फिर आज की अराजकता की बातें हुईं.कंडक्टर उनके उतर जाने के बाद,कमीज झाड़कर,अपनी शेखी बघारने लगा.
Sunday, February 10, 2008
नोक-झोंक
कुमुद बाबू के यहाँ नाश्ता कर के राघव जी से मिलने गया.संयोग अच्छा था,घर पर मिल गये.अपनी उपलब्धियों की चर्चा करते हुए, सद्यः प्रकाशित 'इन्द्रधनुष' कविता संग्रह उन्हें देखने को दे दिया.वे उलटते-पलटते रहे.मैं अपनी बातें उनके कानों में डालता रहा।
बात आई कि कैसे यहाँ के साहित्यकारों के हाथों में मेरी यह किताब पहुँचेगी और उस पर मेरी मौजूदगी में चर्चा हो जैसा आज तक कहीं नहीं हो पाया हो।
राघव जी ने कहा कि आप कल का समय रखें.आठ प्रतियाँ 'इन्द्रधनुष'की रख जाएँ.कल शाम को पांच बजे अपने यहाँ ,अपने लोगों को बुलाऊंगा,आपके सामने किताबें उन्हें मिल जायेंगी और एक मिलना-जुलना हो जाएगा।
ऑफिस जाने का उनका वक़्त हो रहा था.चलते-चलते मैंने उनसे 'संवदिया'के संपादक भोला पादित प्रणयी के ठौर-ठिकाना के बारे में पूछा.उनहोंने एक संकेत दिया,जयप्रकाश नगर के पश्चिम सीमा पर ही उनका छोटा सा निर्माण होगा,एक झोंपड़ी होगी।
राघव जी के घर से निकलने पर मुख्य सड़क पर ही एक रिक्शा मिल गया.रिक्शा चालक से जहाँ जाना है,उस स्थान का ब्योरा बता दिया।
वह चलने को तैयार हो गया.अक्सर रिक्शा पर बैठने के पूर्व मैं हर रिक्शा चालक से भाड़ा तय कर लिया करता हूँ ताकि रिक्शा से उतरने पर भाड़ा को लेकर नोक-झोंक न हो रिक्शा चालक के साथ नहीं हो.चालक ने कहा मुनासिब भाड़ा आप दे देंगे.बैठिये।
मैंने कहा,जिनके यहाँ जा रहा हूँ,वे जो कह देंगे,वही मुनासिब भाड़ा होगा.नई जगह पर किसी भी तलाश में आगे-पीछे कुछ हो जाता है.सही लोकेशन पर पहुँचने में वही हुआ.घरवासी,मानी भोला पंडित प्रणयी के डेरा के आगे रिक्शा से उतर रहा था,तब तक प्रणयी आ गए.उन्होंने कहा ,आप इन्हें पंद्रह रुपये दे दें.चालक अड़ गया कि मुनासिब भाड़ा मेरा अठारह रुपये होता है.नोक-झोंक चलने लगा.मैं पंद्रह पर अदा रहा,क्योंकि साफ वह कह चुका था,घरवासी जो कहेंगे वही मुनासिब भाड़ा होगा।
इस नोक-झोंक के बीच चालक ने कहा,'कुछ मत दीजिए.'मैंने कहा,'ऐसा kyon?'मैं और प्रणयी पक्षधर थे कि चालक को पंद्रह ही दिए जाएँ.उस समय मैं रिक्शा चालक को आप कहना भूल गया.जैसा कि मुख्य मंत्री का एलान है कि मजदूर वर्ग को तुम न कह कर.आप कहा करें.आदतन मजदूर को तुम ही कहा जाता रहा है.अंत में झख मार कर चालक ने पांच का सिक्का वापस किया,क्योंकि उसे दस के दो नोट दे चुके थे।
रिक्शा चालक लौटते हुए कुछ अनाप-शनाप बातें बोलता चला जा रहा था कि मजदूर को लोग सही मजदूरी लोग नहीं देंगे.और अपनी मौज-मस्त में सैकड़ों खर्च कर देंगे.उनका गरीबों के साथ ऐसा ही चलता रहेगा।
मैं सुनता रहा.मेरा विवेक जगा.अपने से पूछना चाह,चालक को उसके मन मुताबिक अठारह दे देता,तो इतना वाकयुद्ध नहीं होता.मेरे लिए तीन रुपये अधिक देने से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं.आये दिन कभी-कभी जिद्द और प्रतिस्थामूलक जद्दोजहद हो ही जाता है.
बात आई कि कैसे यहाँ के साहित्यकारों के हाथों में मेरी यह किताब पहुँचेगी और उस पर मेरी मौजूदगी में चर्चा हो जैसा आज तक कहीं नहीं हो पाया हो।
राघव जी ने कहा कि आप कल का समय रखें.आठ प्रतियाँ 'इन्द्रधनुष'की रख जाएँ.कल शाम को पांच बजे अपने यहाँ ,अपने लोगों को बुलाऊंगा,आपके सामने किताबें उन्हें मिल जायेंगी और एक मिलना-जुलना हो जाएगा।
ऑफिस जाने का उनका वक़्त हो रहा था.चलते-चलते मैंने उनसे 'संवदिया'के संपादक भोला पादित प्रणयी के ठौर-ठिकाना के बारे में पूछा.उनहोंने एक संकेत दिया,जयप्रकाश नगर के पश्चिम सीमा पर ही उनका छोटा सा निर्माण होगा,एक झोंपड़ी होगी।
राघव जी के घर से निकलने पर मुख्य सड़क पर ही एक रिक्शा मिल गया.रिक्शा चालक से जहाँ जाना है,उस स्थान का ब्योरा बता दिया।
वह चलने को तैयार हो गया.अक्सर रिक्शा पर बैठने के पूर्व मैं हर रिक्शा चालक से भाड़ा तय कर लिया करता हूँ ताकि रिक्शा से उतरने पर भाड़ा को लेकर नोक-झोंक न हो रिक्शा चालक के साथ नहीं हो.चालक ने कहा मुनासिब भाड़ा आप दे देंगे.बैठिये।
मैंने कहा,जिनके यहाँ जा रहा हूँ,वे जो कह देंगे,वही मुनासिब भाड़ा होगा.नई जगह पर किसी भी तलाश में आगे-पीछे कुछ हो जाता है.सही लोकेशन पर पहुँचने में वही हुआ.घरवासी,मानी भोला पंडित प्रणयी के डेरा के आगे रिक्शा से उतर रहा था,तब तक प्रणयी आ गए.उन्होंने कहा ,आप इन्हें पंद्रह रुपये दे दें.चालक अड़ गया कि मुनासिब भाड़ा मेरा अठारह रुपये होता है.नोक-झोंक चलने लगा.मैं पंद्रह पर अदा रहा,क्योंकि साफ वह कह चुका था,घरवासी जो कहेंगे वही मुनासिब भाड़ा होगा।
इस नोक-झोंक के बीच चालक ने कहा,'कुछ मत दीजिए.'मैंने कहा,'ऐसा kyon?'मैं और प्रणयी पक्षधर थे कि चालक को पंद्रह ही दिए जाएँ.उस समय मैं रिक्शा चालक को आप कहना भूल गया.जैसा कि मुख्य मंत्री का एलान है कि मजदूर वर्ग को तुम न कह कर.आप कहा करें.आदतन मजदूर को तुम ही कहा जाता रहा है.अंत में झख मार कर चालक ने पांच का सिक्का वापस किया,क्योंकि उसे दस के दो नोट दे चुके थे।
रिक्शा चालक लौटते हुए कुछ अनाप-शनाप बातें बोलता चला जा रहा था कि मजदूर को लोग सही मजदूरी लोग नहीं देंगे.और अपनी मौज-मस्त में सैकड़ों खर्च कर देंगे.उनका गरीबों के साथ ऐसा ही चलता रहेगा।
मैं सुनता रहा.मेरा विवेक जगा.अपने से पूछना चाह,चालक को उसके मन मुताबिक अठारह दे देता,तो इतना वाकयुद्ध नहीं होता.मेरे लिए तीन रुपये अधिक देने से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं.आये दिन कभी-कभी जिद्द और प्रतिस्थामूलक जद्दोजहद हो ही जाता है.
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