दोस्तो!
हम पल दो पल के
साथी हैं
तो करना क्या है
कुछ सोचा है
कुछ विचारा है
कभी गौर किया है
अब तक
कितना खोया
कभी आंका है
वक्त
इंतजार नहीं करता
एकजुट होकर
अंजाम दें
जो करना है
बहुत हो चुका
कीचड़ न उछालें
घात न करें
इसी में
सब का भला है
सबके भला में
आपका भला है
Saturday, December 27, 2008
Friday, December 26, 2008
आखिरी तमन्ना
तुम्हारे पापा-मम्मी ने
तुम्हारा नाम श्रेया रक्खा
श्रेया से तुम सूम्मी हो गयी
घर-आंगन में
तुम दौड़ती-फिरती रही
सुना है, तुम जा रही हो
क्यों?
तुम्हारे मां-बाप ऐसा चाहते हैं
तुम्हारे जाने के बाद
एक शून्यता होगी
उसे अम्मां कैसे झेलेंगी
कैसे भरेंगी
उनकी गोद सूनी हो जायगी
उनका मन उखड़ा-उखड़ा रहेगा
और मेरा भी वैसा ही
सुबह-सवेरे मेरे कमरे में
कौन आयेगी
मीट-सेफ कौन खोलेगी
गोलक में पैसा रोज
कौन डालेगी
अब छुहारा का डिब्बा
खाली नहीं होगा
ब्रेड और केक में
दहिया लग जायेंगे
पूजा के समय
मेरी गोद में
साधिकार कौन बैठेगी
प्रतिमा को
आरती-अगरबत्तियां
कौन दिखायेगी
मेरी रिक्तता कैसे भरेगी!
तिपहिया साइकिल का क्या होगा
मेरी साइकिल की / बेबी-सीट
पर कौन बैठेगी
बगिया के बिरवे
तुम्हारी प्रतीक्षा में
मुरझा जायेंगे
पानी कौन पटायेगी
और अम्मां
उन ख्यालातों में
डूबती-उतराती रहेंगी
गुडिय़ा जैसी, मोम जैसी
सूम्मी को
रात-रात भर
गोद में लिए बैठी रहती थीं
पलकों में नींद नहीं
आती थी
मनौतियां मनाती थीं
सूम्मी चंगी हो जा
हंसने लगे
मुस्कराने लगे
x x x
तुम्हारा आना-जाना
बड़े पापा-मम्मी के घर
बना रहेगा
पर अम्मां नहीं रहेंगी
मैं नहीं रहूंगा
और तब
तुम पर क्या बीतेगा
बेटा।़ संसार में यही होता है
जो आता है, वह जाता है
उसकी स्मृतियां
आती हैं-जाती हैं
x x x
तुम जाओ
अम्मा विदा करेंगी
मैं विदा करूंगा
बड़ी अम्मां बिलखेंगी
खुशी-खुशी जाओ
खूब पढऩा
बड़ा आदमी बननायही मेरी आखिरी तमन्ना है।
तुम्हारा नाम श्रेया रक्खा
श्रेया से तुम सूम्मी हो गयी
घर-आंगन में
तुम दौड़ती-फिरती रही
सुना है, तुम जा रही हो
क्यों?
तुम्हारे मां-बाप ऐसा चाहते हैं
तुम्हारे जाने के बाद
एक शून्यता होगी
उसे अम्मां कैसे झेलेंगी
कैसे भरेंगी
उनकी गोद सूनी हो जायगी
उनका मन उखड़ा-उखड़ा रहेगा
और मेरा भी वैसा ही
सुबह-सवेरे मेरे कमरे में
कौन आयेगी
मीट-सेफ कौन खोलेगी
गोलक में पैसा रोज
कौन डालेगी
अब छुहारा का डिब्बा
खाली नहीं होगा
ब्रेड और केक में
दहिया लग जायेंगे
पूजा के समय
मेरी गोद में
साधिकार कौन बैठेगी
प्रतिमा को
आरती-अगरबत्तियां
कौन दिखायेगी
मेरी रिक्तता कैसे भरेगी!
तिपहिया साइकिल का क्या होगा
मेरी साइकिल की / बेबी-सीट
पर कौन बैठेगी
बगिया के बिरवे
तुम्हारी प्रतीक्षा में
मुरझा जायेंगे
पानी कौन पटायेगी
और अम्मां
उन ख्यालातों में
डूबती-उतराती रहेंगी
गुडिय़ा जैसी, मोम जैसी
सूम्मी को
रात-रात भर
गोद में लिए बैठी रहती थीं
पलकों में नींद नहीं
आती थी
मनौतियां मनाती थीं
सूम्मी चंगी हो जा
हंसने लगे
मुस्कराने लगे
x x x
तुम्हारा आना-जाना
बड़े पापा-मम्मी के घर
बना रहेगा
पर अम्मां नहीं रहेंगी
मैं नहीं रहूंगा
और तब
तुम पर क्या बीतेगा
बेटा।़ संसार में यही होता है
जो आता है, वह जाता है
उसकी स्मृतियां
आती हैं-जाती हैं
x x x
तुम जाओ
अम्मा विदा करेंगी
मैं विदा करूंगा
बड़ी अम्मां बिलखेंगी
खुशी-खुशी जाओ
खूब पढऩा
बड़ा आदमी बननायही मेरी आखिरी तमन्ना है।
Wednesday, December 24, 2008
क्या करूं
एक अहम प्रश्न
अब क्या करूं?
करता रहा / चलता रहा
थका नहीं / हारा नहीं
रूका नहीं
शाबासी नहीं मिली
ठकुरसुहाती मिली
छला गया / भरमाया गया
फिर भी डटा रहा
बेबसी में जीता रहा
चमक-दमक भी देखी
आंखें चौंधिया गयीं
फिर भी दौड़ता रहा
हारा नहीं
तमन्नायें थीं
कुछ पूरी हुई / कुछ बाकी हैं
उम्मीदें बंधी हैं
पूरा करूंगा
खिलाफ में / मोहरे बिछे हैं
परवाह नहीं
हिम्मत बुलंद है
कुछ कर गुजरना है
जो भी गंवाना पड़े
अंगूठा दिखलानेवाले / दिखलाते रहें
व्यंग्य-वाण छोड़ते रहें / ठिठोली करते रहें
बेअसर हूं
जवाब क्या दूं / क्यों दूं
हमें कुछ करना है / कर रहा हूं
समय की रेत पर / पदचिह्न छोड़ जाऊंगा
अब क्या करूं?
करता रहा / चलता रहा
थका नहीं / हारा नहीं
रूका नहीं
शाबासी नहीं मिली
ठकुरसुहाती मिली
छला गया / भरमाया गया
फिर भी डटा रहा
बेबसी में जीता रहा
चमक-दमक भी देखी
आंखें चौंधिया गयीं
फिर भी दौड़ता रहा
हारा नहीं
तमन्नायें थीं
कुछ पूरी हुई / कुछ बाकी हैं
उम्मीदें बंधी हैं
पूरा करूंगा
खिलाफ में / मोहरे बिछे हैं
परवाह नहीं
हिम्मत बुलंद है
कुछ कर गुजरना है
जो भी गंवाना पड़े
अंगूठा दिखलानेवाले / दिखलाते रहें
व्यंग्य-वाण छोड़ते रहें / ठिठोली करते रहें
बेअसर हूं
जवाब क्या दूं / क्यों दूं
हमें कुछ करना है / कर रहा हूं
समय की रेत पर / पदचिह्न छोड़ जाऊंगा
Monday, December 22, 2008
मन
हाथ-पांव
आंख-कान
किसके इशारे पर
चलते हैं
हुक्म किसका
चलता है
इन्हें क्रियाशील बनाने में
एक्टिव रोल
किसका होता है
क्या मन का
x x x
मन दिखाई नहीं देता
वह पारदर्र्शी नहीं
पर मन
सबको नचाता है
इन पर कंट्रोल
मन का होता है
मन के पास
अज्ञात-सूक्ष्म
कार्डलेस तरंग है
जो
ध्वनि, विद्युत से
अधिक शक्तिशाली है।
आंख-कान
किसके इशारे पर
चलते हैं
हुक्म किसका
चलता है
इन्हें क्रियाशील बनाने में
एक्टिव रोल
किसका होता है
क्या मन का
x x x
मन दिखाई नहीं देता
वह पारदर्र्शी नहीं
पर मन
सबको नचाता है
इन पर कंट्रोल
मन का होता है
मन के पास
अज्ञात-सूक्ष्म
कार्डलेस तरंग है
जो
ध्वनि, विद्युत से
अधिक शक्तिशाली है।
Saturday, December 20, 2008
सीमा
हर इंसान
जब सीमा लांघता है
विवाद छिड़ जाते हैं
हर को
सीमा के अंदर रहना चाहिए
x x क्ष
दो राष्ट्रों के बीच
सीमा विवाद रहता है
सीमा की रक्षा
करनी पड़ती है
झड़पें होती रहती हैं
चौकन्ना रहना पड़ता है
दुश्मन ताक में रहता है
औचक हमला कर बैठता है
x x x
हर इंसान
शांति चाहता है
पर बाहर-भीतर
वह शान्त कहां रहता है
आखिर
वह चाहता क्या है?
जब सीमा लांघता है
विवाद छिड़ जाते हैं
हर को
सीमा के अंदर रहना चाहिए
x x क्ष
दो राष्ट्रों के बीच
सीमा विवाद रहता है
सीमा की रक्षा
करनी पड़ती है
झड़पें होती रहती हैं
चौकन्ना रहना पड़ता है
दुश्मन ताक में रहता है
औचक हमला कर बैठता है
x x x
हर इंसान
शांति चाहता है
पर बाहर-भीतर
वह शान्त कहां रहता है
आखिर
वह चाहता क्या है?
Wednesday, December 17, 2008
तन्हाई
तन्हाई / एक प्रेमी का
तन्हाई में
रात-रात भर
करवटें बदलता रहा
आंसू से तकिया
भिंगोता रहा
बात कुछ नहीं थी
बेबात मासूका
रूठ गई
छान पगहा तुड़ाकर
चली गई
फोन करता हूं
रिंग होता रहा
फोन उठाती नहीं
बेबस हूं / लाचार हूं
कुछ सुहाता नहीं
कुछ भाता नहीं
आज कोर्ट की नोटिस मिली
पढ़ते ही गस खा गया
यह क्या हो गया
तलाक की नोटिस है
शेष जिन्दगी का
क्या होगा?
कहां जाऊं
क्या डूब मरूं!
समाज क्या कहेगा
कैसा नामर्द था
डूब मरा।
तन्हाई / एक प्रेमिका की
आंखें बंद
दीखता है
कुछ साफ
वैसा कुछ हो गया
बेमिसाल
संभावना के परे
हैरत में हूं
बखान ब्यौरा
सुनाकर क्या होगा
जग हंसाई होगी
पहाड़-सी जिन्दगी
तन्हाई में
अब कैसे कटेगी?
तन्हाई / एक बूढ़े की
वृद्धाश्रम
8 x 8 का कमरा
शेष जिन्दगी यहीं कटेगी
आनन्द है
भाई-बंद हैं
मिलना-जुलना होता रहता है
मुस्कान लिए सलाम-बंदगी होती है
आदान-प्रदान कुशल क्षेम का होता है
पर आधी रात को
नींद टूट जाती है
साफ दीखता है
पहले पत्नी गई
बड़ा बेटा प्लेन क्रैश में गया
दूसरा कैंसर से चला गया
उसके इलाज में
घर गया
तीसरे का संरक्षण था
वह बीबी-बच्चों के साथ
अमरीका चला गया
पांच वर्षों के लिए
खेवा खर्च मेरे लिए
आश्रम में जमा कर गया
भार मुक्त हो गया
गंगा नहा गया / हाथ झाड़ गया
टूट चुका हूं
तन्हाई में जीता हूं
मौत हाथ में नहीं
आबाद रहे यह आश्रम
मेरा नया घर।
समरस कविता संग्रह से उद्धृत
तन्हाई में
रात-रात भर
करवटें बदलता रहा
आंसू से तकिया
भिंगोता रहा
बात कुछ नहीं थी
बेबात मासूका
रूठ गई
छान पगहा तुड़ाकर
चली गई
फोन करता हूं
रिंग होता रहा
फोन उठाती नहीं
बेबस हूं / लाचार हूं
कुछ सुहाता नहीं
कुछ भाता नहीं
आज कोर्ट की नोटिस मिली
पढ़ते ही गस खा गया
यह क्या हो गया
तलाक की नोटिस है
शेष जिन्दगी का
क्या होगा?
कहां जाऊं
क्या डूब मरूं!
समाज क्या कहेगा
कैसा नामर्द था
डूब मरा।
तन्हाई / एक प्रेमिका की
आंखें बंद
दीखता है
कुछ साफ
वैसा कुछ हो गया
बेमिसाल
संभावना के परे
हैरत में हूं
बखान ब्यौरा
सुनाकर क्या होगा
जग हंसाई होगी
पहाड़-सी जिन्दगी
तन्हाई में
अब कैसे कटेगी?
तन्हाई / एक बूढ़े की
वृद्धाश्रम
8 x 8 का कमरा
शेष जिन्दगी यहीं कटेगी
आनन्द है
भाई-बंद हैं
मिलना-जुलना होता रहता है
मुस्कान लिए सलाम-बंदगी होती है
आदान-प्रदान कुशल क्षेम का होता है
पर आधी रात को
नींद टूट जाती है
साफ दीखता है
पहले पत्नी गई
बड़ा बेटा प्लेन क्रैश में गया
दूसरा कैंसर से चला गया
उसके इलाज में
घर गया
तीसरे का संरक्षण था
वह बीबी-बच्चों के साथ
अमरीका चला गया
पांच वर्षों के लिए
खेवा खर्च मेरे लिए
आश्रम में जमा कर गया
भार मुक्त हो गया
गंगा नहा गया / हाथ झाड़ गया
टूट चुका हूं
तन्हाई में जीता हूं
मौत हाथ में नहीं
आबाद रहे यह आश्रम
मेरा नया घर।
समरस कविता संग्रह से उद्धृत
Tuesday, December 16, 2008
हाय रे पानी
हाय रे पानी!
तुम्हारे बिना सब सूना
आदमी बेहाल बेकल
झगड़ा छिड़ गया
सर फूट गया
धूप, हवा, पानी
सबकी अमानत है
सृष्टि की देन है
एक का नहीं
सबका है
रोटी तो
आग पर सेंकी जाती है
पानी पर
रोटी गल जाती है
धैर्य से काम लो
रास्ता निकालो
पानी सबको चाहिए
इसके बिना कोई रह नहीं सकता
पानी का दोहन नहीं करो
यह राष्ट्रीय संपदा है
इस पर सबका अधिकार है
समानता का युग है
मिल बैठकर रास्ता निकालो
सभी नदियों को जोड़ो
अजस्र धारा बहाओ
पानी सबको मिले - सबका काम चले
सिर्फ कावेरी के लिए
क्यों झगड़ते हो
रोटी बांटकर खाओ
समरस कविता संग्रह से उद्धृत
तुम्हारे बिना सब सूना
आदमी बेहाल बेकल
झगड़ा छिड़ गया
सर फूट गया
धूप, हवा, पानी
सबकी अमानत है
सृष्टि की देन है
एक का नहीं
सबका है
रोटी तो
आग पर सेंकी जाती है
पानी पर
रोटी गल जाती है
धैर्य से काम लो
रास्ता निकालो
पानी सबको चाहिए
इसके बिना कोई रह नहीं सकता
पानी का दोहन नहीं करो
यह राष्ट्रीय संपदा है
इस पर सबका अधिकार है
समानता का युग है
मिल बैठकर रास्ता निकालो
सभी नदियों को जोड़ो
अजस्र धारा बहाओ
पानी सबको मिले - सबका काम चले
सिर्फ कावेरी के लिए
क्यों झगड़ते हो
रोटी बांटकर खाओ
समरस कविता संग्रह से उद्धृत
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