शबनम
तुम घर की बेटी हो
पराये घर
चली जाओगी
आये दिन तुम टांग
क्यों अराती हो
इस घर में
तुम्हारा कोई
वजूद नहीं बनता
"पापा! ऐसा क्यों?
बेटी का कोई वजूद
पिता के घर में
नहीं होता क्या?"
मम्मी ने कहा
हां शबनम
पापा ठीक कहते हैं
तुम्हारी शेखी
फबती नहीं
राहुल का अधिकार बनता है
जिसका अधिकार बनता है
वह कुछ नहीं बोलता
टांग नहीं अड़ाता है।
Monday, January 12, 2009
Saturday, January 10, 2009
घर
चिडिय़ा
घोंसला बनाती है
आदमी
घर बनाता है
उद्देश्य
दोनों के समान
चिडिय़ा शाम होते ही
अपने घोंसलों में
घुस जाती हैं
आदमी के घर
लौटने का ठिकाना नहीं
पर
वह भी
जब घर लौटता है
बंद दरवाजे पर दस्तक देता है
स्विच दाबता है घंटी बजती है
प्रतीक्षा में जगी पड़ी बीवी
दरवाजा खोलती है तो
दोनों के मिलन का वह क्षण
कितना सुखद होता है
ऐसा प्राय: सबको
नसीब में मिला होता है
किन्तु जिस घर में
घुसते ही झिड़कियां मिलती हों
कैफियत तलब हो जाए
दरवाजे पर ही उस मर्द को
वह घर कैसा लगता होगा
घर काटता भी है
नसीब अपना-अपना होता है।
घोंसला बनाती है
आदमी
घर बनाता है
उद्देश्य
दोनों के समान
चिडिय़ा शाम होते ही
अपने घोंसलों में
घुस जाती हैं
आदमी के घर
लौटने का ठिकाना नहीं
पर
वह भी
जब घर लौटता है
बंद दरवाजे पर दस्तक देता है
स्विच दाबता है घंटी बजती है
प्रतीक्षा में जगी पड़ी बीवी
दरवाजा खोलती है तो
दोनों के मिलन का वह क्षण
कितना सुखद होता है
ऐसा प्राय: सबको
नसीब में मिला होता है
किन्तु जिस घर में
घुसते ही झिड़कियां मिलती हों
कैफियत तलब हो जाए
दरवाजे पर ही उस मर्द को
वह घर कैसा लगता होगा
घर काटता भी है
नसीब अपना-अपना होता है।
Thursday, January 8, 2009
छड़ी
छड़ी
संबल है
साथी है
भाई है
सहारा है
हाथ में रहने पर
भौंकते कुत्ते को
भगाती है
सांप मार सकती है
प्रहार होने पर
रक्षा करती है
प्रहार करने पर
मददगार होती है
बुढ़ापे का संबल है
बूढ़े का दोस्त है
संबल है
साथी है
भाई है
सहारा है
हाथ में रहने पर
भौंकते कुत्ते को
भगाती है
सांप मार सकती है
प्रहार होने पर
रक्षा करती है
प्रहार करने पर
मददगार होती है
बुढ़ापे का संबल है
बूढ़े का दोस्त है
Tuesday, January 6, 2009
नफरत
आदमी को आदमी से नफरत क्यों?
वह कौन था
जो जिन्दा जलाया गया
जिसने जलाया उसे क्या कहूं?
जल्लाद-राक्षस-निर्मम
उस आदमी का कसूर क्या था
यदि वह कसूरवार था
तो उसे कानून के हवाले
क्यों नहीं किया गया?
X X X
आदमी में नफरत कौन फैलाता है
नफरत की तालीम कहां मिलती है
क्या हम बर्बरता की ओर जा रहे हैं
X X X
अंत क्या होगा
हश्र क्या होगा
क्या हम कट मर जायेंगे
धर्म के नाम पर
धर्म ऐसा करने को नहीं कहता
नफरत का बीज किसने फैलाया
जहर क्यों बोया गया
जब बोया गया
तो काटना ही होगा
वह कौन था
जो जिन्दा जलाया गया
जिसने जलाया उसे क्या कहूं?
जल्लाद-राक्षस-निर्मम
उस आदमी का कसूर क्या था
यदि वह कसूरवार था
तो उसे कानून के हवाले
क्यों नहीं किया गया?
X X X
आदमी में नफरत कौन फैलाता है
नफरत की तालीम कहां मिलती है
क्या हम बर्बरता की ओर जा रहे हैं
X X X
अंत क्या होगा
हश्र क्या होगा
क्या हम कट मर जायेंगे
धर्म के नाम पर
धर्म ऐसा करने को नहीं कहता
नफरत का बीज किसने फैलाया
जहर क्यों बोया गया
जब बोया गया
तो काटना ही होगा
Saturday, January 3, 2009
जटायु
कभी गौर किया है
आकाश सूना- सूना
क्यों दिखता है
जटायु प्रजाति का
विलोप तो नहीं हो गया
गिद्ध
न नीचे, न ऊपर
न पेड़ों पर
कहीं नहीं दिखता
अंजाम क्या होगा!
उस दिन
घर लौट रहा था
सड़क किनारे
बूढ़ा बैल का रक्तिम
ढ़ांचा पड़ा था
दुर्गन्ध फैल रहा था
नाक पर रूमाल रख
जल्दी से आगे
बढ़ गया
इक्का- दुक्का कुत्ता
कौआ चोंच
मार रहा था
इक्कीसवीं सदी की यह त्रासदी
भविष्य में
क्या?
इन जानवरों के लिए
कब्रगाह बनवाना होगा?
आकाश सूना- सूना
क्यों दिखता है
जटायु प्रजाति का
विलोप तो नहीं हो गया
गिद्ध
न नीचे, न ऊपर
न पेड़ों पर
कहीं नहीं दिखता
अंजाम क्या होगा!
उस दिन
घर लौट रहा था
सड़क किनारे
बूढ़ा बैल का रक्तिम
ढ़ांचा पड़ा था
दुर्गन्ध फैल रहा था
नाक पर रूमाल रख
जल्दी से आगे
बढ़ गया
इक्का- दुक्का कुत्ता
कौआ चोंच
मार रहा था
इक्कीसवीं सदी की यह त्रासदी
भविष्य में
क्या?
इन जानवरों के लिए
कब्रगाह बनवाना होगा?
Friday, January 2, 2009
आम आदमी
आम आदमी / भगवान भरोसे जीता है
उसे शिकवा-शिकायत / किसी से नहीं होती
वन निर्द्वन्द्व विचरण करता है
जहां तबीयत होती है
रोजी-रोटी की तलाश में
निकल जाता है / सीधा-सपाटा
सपाट जिन्दगी / उसकी होती है
देवी-देवता, मंदिर के आगे / सिर झुका लेता है
राम मड़ैया में / जिन्दगी काट लेता है
अब कुछ-कुछ / बूझने लगा है
उसके फिनानसर / मुखिया-महाजन
बन जाते हैं
दस रुपये सैकड़े / माहवारी ब्याज पर
कर्ज लेकर / दूर-दराज
कमाने निकल जाता है
आम आदमी आज बेचैन नहीं है
चैन की जिन्दगी / बेहतर जिन्दगी
तनाव रहित जिन्दगी / उन्हें नसीब है
कभी पानी पीकर भी सो जाता है
बुरे दिनों के लिए
कुछ बचा नहीं पाता है
नीचे धामी / ऊपर भगवान
भरोसे जीता है / वह समझता है
खास आदमी की / दुनिया अलग होती है।
उसे शिकवा-शिकायत / किसी से नहीं होती
वन निर्द्वन्द्व विचरण करता है
जहां तबीयत होती है
रोजी-रोटी की तलाश में
निकल जाता है / सीधा-सपाटा
सपाट जिन्दगी / उसकी होती है
देवी-देवता, मंदिर के आगे / सिर झुका लेता है
राम मड़ैया में / जिन्दगी काट लेता है
अब कुछ-कुछ / बूझने लगा है
उसके फिनानसर / मुखिया-महाजन
बन जाते हैं
दस रुपये सैकड़े / माहवारी ब्याज पर
कर्ज लेकर / दूर-दराज
कमाने निकल जाता है
आम आदमी आज बेचैन नहीं है
चैन की जिन्दगी / बेहतर जिन्दगी
तनाव रहित जिन्दगी / उन्हें नसीब है
कभी पानी पीकर भी सो जाता है
बुरे दिनों के लिए
कुछ बचा नहीं पाता है
नीचे धामी / ऊपर भगवान
भरोसे जीता है / वह समझता है
खास आदमी की / दुनिया अलग होती है।
Thursday, January 1, 2009
जीवन-मृत्यु
जीवन-मृत्यु
दोनों शाश्वत
मांगने से नहीं मिलते
कुछ हद तक
एक वश में
दूसरा औचक
एक आता है
एलानिया
दूसरी (मौत)
ले जाती है
चुपचाप
झटके में
मौत
कोई चाहता है!
कोई नहीं चाहता
जिन्दा रहकर
हम करते क्या हैं
कर्म, कुकर्म, सुकर्म
किसके लिये
अपनों के लिये
बाल-बच्चों के लिये
दोनों शाश्वत
मांगने से नहीं मिलते
कुछ हद तक
एक वश में
दूसरा औचक
एक आता है
एलानिया
दूसरी (मौत)
ले जाती है
चुपचाप
झटके में
मौत
कोई चाहता है!
कोई नहीं चाहता
जिन्दा रहकर
हम करते क्या हैं
कर्म, कुकर्म, सुकर्म
किसके लिये
अपनों के लिये
बाल-बच्चों के लिये
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