Monday, December 15, 2008

शब्द

शब्द
एक सेतु है
संप्रेषण है
अमर है
व्योम में
सदा विद्यमान है
एक जाल है
जंजाल है
फंसाता है
उबारता है
रक्षक है
भक्षक है
अलंकृत करता है
नंगा करता है
अभिशाप है
वरदान है।

समरस कविता संग्रह से उद्धृत

Sunday, December 14, 2008

अम्मां-मां

ममतामयी करुणामयी
दयामयी
अम्मां-मां-मां
बेटे की अम्मां
बहू की अम्मां
पोते-पोतियों की अम्मां
मेरी, तेरी, सबकी अम्मां
क्या है उनमें
हिमालय की ऊंचाई है
सागर की गहराई है
प्यार भरा है
दुलार भरा है

x x x

अम्मां इस घर में
पचास की दशक में आयीं
उस समय वह
किसी की बहू थीं
घर में सास-ससुर का संरक्षण था
ननदें थीं
दाबन में रहना था

x x x

और आज
इस शती के अंत में
अम्मां के आगे-पीछे
बहुएं हैं बेटे हैं
पोते-पोतियां हैं
घर-आंगन भरापूरा है
वह जग-जननी हैं
जीवन-यज्ञ में
आहुतियां देती रहीं
अपने को होम दिया
मन की पीड़ा
मन की व्यथा वेदना
कहें तो किससे
नीलकंठ बनकर
गरलपान करती रहीं
दोनों हाथों लुटाती रहीं
प्यार, दुलार, पुचकार
अम्मां-मां-मां।

समरस कविता संग्रह से उद्धृत

Saturday, December 13, 2008

ये बच्चे

ये बच्चे
भावी पीढ़ी की
अमानत हैं
धरोहर हैं
देश की
पढ़ते हैं
कहां
जहां
कुछ घंटों की
प्रात: कालीन
उनकी शाला है
सच कहें तो
चरवाहाशाला है
वहां पढऩे आते हैं
बच्चे खाली पेट
शाला से छूटते ही
घर में रूखा-सूखा
कुछ खा कर
जुट जाते हैं
चरवाही में
गोबर बटोरने में
बकरियां चराने में
भाई बहनों को
संभालने में
उनका बाकी समय
ऐसे ही गुजर जाता है

समरस कविता संग्रह से उद्धृत

Thursday, December 11, 2008

वक्त

आदमी
वक्त का
गुलाम है
वक्त
ठहरता नहीं
वक्त के साथ
चलना पड़ता है
वक्त
बेरहम होता है
वक्त ने साथ दिया
तो इंसान
कहां से कहां
चला जाता है
वक्त ने साथ
नहीं दिया
तो धूल चटा देता है
वक्त की पहचान
मुश्किल है
जिसने पहचाना
पौ-बारह है
जिसने कोताही की
गया काम से
सब नहीं / कोई-कोई
वक्त को / मुट्ठी में
किये रहता है
उसके आगे-पीछे
लोग लगे रहते हैं
सिर आंखों पर
उठाये रहते हैं।

समरस कविता संग्रह से उद्धृत

Tuesday, December 9, 2008

मुरादें

बृद्ध पिता ने बेटा को फोन किया, 'हम दोनों बारह बजे दिन में पहुंचेंगे।'
बेटा ने जवाब दिया, 'तो क्या मैं नौकरी छोड़ दूं।'
पिता स्तब्ध हो गए। कहा, 'नहीं, नहीं, बेटा नौकरी क्यों छोड़ोगे? ' कहो, 'कब यहां से चलूं। बस में चार घंटे लगते हैं।'
बेटा ने जवाब दिया, 'आप ऐसा चलें कि उस समय तक घर पर बच्चे स्कूल से आ जाएं।'

बस पर हम दोनों को नाती ने चढ़ा दिया। बिदा किया। टिकट कटा दिया। बस खुल गई। पहचाना रास्ता था। बचपन से इस रास्ते पर चलता रहा हूं। उस समय गांधी सेतु कहां था? छपरा से सोनपुर, सोनपुर से घटही गाड़ी से पहलेजा घाट। पहलेजा घाट से महेन्द्रू। जहाज पर गंगा नदी पार करना पड़ता था। कभी उफनती और मंद गति से बहने वाली गंगा के दर्शन। जहाज पर चढऩे के पहले, हम एक डुबकी गंगा में अवश्य लगा लिया करते थे।

कभी कुशासन काल में स्टेट बस बंद हो गई थी। सुशासन काल में स्टेट बस पुन: चालू हो गई है। नन स्टॉप बस पर नाती ने चढ़ाया था। देखते-देखते हाईवे से गंडक नदी पार कर हाजीपुर की परिक्रमा करते हुए गांधी सेतु पर बस आ गई। गाय घाट और पटना सिटी के पैसेंजरों को उतारते हुए बस पटना बाई पास होकर इनकम टैक्स के पास आ गई। वहीं उतरने को कहा गया था। कंडक्टर ने सामान उतारने में मदद की। पत्नी उतर चुकी थीं। सुखद आश्चर्य देखकर हुआ कि बेटा आ गए थे। हम दोनों की दिनों दिन विवशता और लाचारी बढ़ती जा रही है। इसी का खयाल कर बेटा ने सोचा होगा कि नहीं मुझे मुकाम पर रहना चाहिए। हमने सोचा, शायद रिक्शा पर बेटा ले जाएगा। पर नहीं, अपनी कार से आया था। कार पर बिठाकर ले गया।
हमारा एक सपना यह भी था कि हमारे बुढ़ापे में बेटे उस औकात के हो जाते कि वे अपनी गाड़ी से रिसीव करने आते और रेल गाड़ी पर चढ़ाने के लिए स्टेशन पहुंचाते। आज वही हो रहा है।
मन की मुरादें किसी की पूरी हों।' सपना साकार होता रहे तो खुशियों का अंबार लग जाता है।

Friday, December 5, 2008

बोलती बंद

गफूर भाई तेज तर्रार किस्म के आदमी हैं। लोग उनकी उम्र पूछते हैं, "दादा हो, आपकी उम्र क्या हुई।" तपाक से कह बौठते हैं, "जरा तू ही बता, मेरी उम्र क्या हो सकती है?" "बड़का भूकम्प के वख्त आप कित्ते साल के थे।" "उस वख्त की बात करते हो, दो जमात पास कर गया था।"
"दादा, गजब की बात करते हो!"
"क्या हुआ बे!"
"दो जमात से बात कहां खुलती है कि आप कित्ते बरस के थे।"
"ओ! तो तुम उमर जानना चाहता है। अब समझा। यही बारह-चौदह साल का होगा।"
फिर गफूर भाई बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गए। कम्बखत सब उमर पूछते रहता है। क्या बूढ़ा होना गुनाह होता है। आज बच्चा पैदा होता है, बड़ा होता है। जवान होता है। तालीम हासिल करता है। निकाह होता है। नौकरी लग जाती है। अपनी औलाद की परवरिश करता है। उसी तरह तुम भी बूढ़ा होगा। बच्चा, बूढ़ा, यह सिलसिला तो लगा है।
छड़ी टेकते, घर की ओर डेग भरते हुए, गफूर भाई बढ़ते जा रहे थे। पाकेट में पैसा टटोला। खुशी हुई। "अमां, यार अपने को कहा। तो क्या कुछ हो जाय। "सुधा" का काउंटर आगे आ रहा था। रहमत भाई, सुधा काउंटरवाले उनको देख रहे थे। टोक दिया। "भाई जान, कहां गए थे। अकेले चलते हैं। किसी बच्चे को संग क्यों नहीं कर लिया?" इस पर आव देखा न ताव। उस पर गफूर भाई, बिगड़ बैठे।
गजब के तुम हो? तुम्हारा जर्जर बदन देखकर कोई चेताता है। रहमत भाई ने तुम्हारी भलाई की बात की है। और तुम बिगड़ बौठे, उन पर।
जाने दो, देखो रहमत भाई से पूछो न, क्या सब है! रहमत भाई से रू-ब-रू होते ही पूछ बैठे, "क्या सब है?"
"सब कुछ है।" रहमत भाई का जवाब मिला।
फिर गफूर भाई की मजबूरी का आलम आ खड़ा हुआ। ससुरी सरकार जहां-तहां अपने " सुधा" सेल पाइंट काउंटर एक ही डिजाइन की बनाती है। राजधानी से छोटे बड़े शहर तक फैला रखी है। इसके ब्रांड की तारीफ गुनते रहे। कमाल का पेड़ा होता है। पांच से लेकर चौदह रूपये तक का, स्ट्राबेरी का आइसक्रीम। रसगुल्ला, दही, लस्सी..
गफूर भाई की मजबूरी रहमत मियां ताड़ गए। रूकिये मैं आ जाता हूं। और गफूर भाई का हाथ पकड़ कर ऊपर ओटे पर चढ़ा लिया। गफूर भाई एक ओर खड़े थे। दो ग्राहक आ गए। एक ने एक लीटर दूध की मांग की। पाकेट से नंबरी निकाला। इस पर रहमत मियां ने तपाक से कहा। "नंबरी का खुदरा नहीं है। चट से ग्राहक ने कहा, "पचास देता हूं।" दूध लिया खुदरा वापसी में रहमत भाई ने दो टॉफी, नोट और सिक्का दिया था।
"दूध का कित्ता पइसा काटे।"
"चौदह रुपये।"
"ज्यादा क्यों?"
"दाम बढ़ गया है।" वह वापसी पैसे को मिलाने लगा। दस का नोट तीन है, एक पांच का है। "कित्ता हुआ?" रहमत भाई ने पूछा।
"पैंतीस।" उस लड़के ने कहा।
"ठीक है, और दो टॉफी का दाम एक रुपया। हुआ न छत्तीस।"
उसके बाद दूसरे ग्राहक से निबटने के बाद गफूर भाई से पूछा, "आपको क्या चाहिए?"
"लस्सी।"
"नहीं है।"
"पेड़ा ले लें, चौदह का है।"
गफूर भाई रूक गए।
"फिर आइसक्रीम है, पांच, दस और चौदह का।" रहमत भाई ने कहा।
"दस का दे दो।" गफूर भाई बोले। रहमत भाई ने दस का आईसक्रीम आगे किया। प्लास्टिक का चम्मच दिया। फिर गफूर भाई बिफर पड़े। रहमत भाई से पूछा। यहां-वहां चिपटा हुआ आइसक्रीम का खाली कप। लगता है चादर सफेद बिछी है। डस्ट बिन क्यों नहीं रखते? गफूर भाई ने सवाल रक्खा!
क्या करें साहब। मुख्यमंत्री का बेल्ट है। गली, कूची सब बन गया है। यह रास्ता फ्रोफेसर कॉलोनी जाती है। यहां के लोग जदयू के नहीं हैं। यहां नगरपालिका का झाड़ू देनेवाला भी नहीं आता है।
गफूर भाई के नहाने का वक्त हो रहा था। बाल बनाने गए थे। गप्प भी चल रहा था। आइसक्रीम चाट गए। छड़ी हाथ में ली। ओटा से उतर गए। फिर आगे कदम-ब-कदम डेग बढ़ाते हुए घर की ओर जा रहे थे।
फिर भीतर की आवाज आई, तुम्हारा चटोरपन गया नहीं। चौदह का पेड़ा ले लेते तो घर भर खाते।
सैलून से हजामत बनाकर लौटे हो। बीवी जान को जवाब देना। वहां भी हजामत बनेगी।
घंटी बजाई। किवाड़ खुला। पंखा खोलकर बैठ गए। उधर से पोते-पोतियां आईं। बीवी जान आईं । पूछा, "कुछ लाये नहीं!" गफूर भाई की घिग्घी बंध गई।

Thursday, December 4, 2008

हसीना

ये गेसू
ये झुमके
ये बिंदिया
ये बेसर
ये खनकती चूडिय़ां
ये चांद-सा मुखड़ा
ये हिरणी सी आंखें
ये छरहरा बदन
ये सलवार
ये चुन्नी
चालों में शोखी
दिल धडक़ता है
मन करता है
तमन्ना होती है
एक बोसा ले लूं
तुम पर निसार हो जाऊं

समरस कविता संग्रह से